मंगलवार को भारतीय सेना की ओर से जारी बयान में, इस दौरे को ऐतिहासिक बताते हुए आया है, चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ जनरल नरवने के इस दौरे का लक्ष्य, इन दो राष्ट्रों के साथ देश के रणनैतिक और रक्षा सहयोग को मज़बूत बनाना है।
भारत का फ़ार्स की खाड़ी के देशों के साथ ऐतिहासिक संबंध है क्योंकि वह अपनी ज़रूरत के पेट्रोलियम प्रोडक्ट का बड़ा भाग इसी इलाक़े से ख़रीदता है, लेकिन पिछले कुछ साल में मोदी सरकार ने सुरक्षा और रक्षा संबंध को ख़ास तौर पर यूएई के साथ बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित किया है।
नई दिल्ली की जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में असोशिएट प्रोफ़्रेसर हैपीमॉन जैकब का कहना है कि सेना प्रमुख का यूएई और सऊदी अरब का दौरा, इन दोनों देशों के साथ सुरक्षा भागीदारी बढ़ाना नई दिल्ली की पुरानी इच्छा थी लेकिन चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेन्स स्टाफ़ या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बजाए थल सेना प्रमुख के दौरे से मन में सवाल उठते हैं।
सऊदी अरब और यूएई कश्मीर के मुद्दे पर ख़ामोश रहे जिसपर पिछले महीने पाकिस्तान का आक्रोश सामने आया। यूएई ने पाकिस्तान सहित 13 देशों के लिए वर्क और टूरिस्ट वीज़े पर रोक लगा दी है।
अमरीका स्थित विल्सन सेंटर में एशिया प्रोग्राम के डिप्टी डायरेक्टर माइकल क्यूगलमैन का कहना है कि भारत-सऊदी अरब के बीच भागीदारी बढ़ने के लक्ष्य काफ़ी दिनों पहले ज़ाहिर होने लगे थे।
उनका कहना है कि भारत पश्चिम एशिया में ख़ास तौर पर ऊर्जा सहयोग बढ़ाना चाहता है ख़ास तौर पर ऐसे समय जब वह अमरीकी पाबंदियों की वजह से ईरान से आयात नहीं कर रहा है।
उन्होंने कहा कि ईरान-सऊदी अरब के बीच प्रतिद्वंद्विता तेज़ी से ख़तरनाक हो रही है, ख़ात तौर पर इस्राईल के साथ कई अरब राष्ट्रों के संबंध बढ़ने के ट्रेंड के बाद। यह बात समझ में भी आती है रियाज़ नई दिल्ली को अपने साथ करने की कोशिश करेगा, जिसके इस्राईल से संबंध बढ़ रहे हैं।